Thursday, 5 December 2013

ग़ुबार

दिल का ग़ुबार  निकल जाए
तो दिल खाली सा हो जाता है
दिल में ही बसर करता हूँ
आवारगी अपनी
सितारों में घिरा चाँद भी
तनहा रह जाता है.…

भीग जाता है दिल
खारे बूंदों के बरसात में
एक दिन होगा जब
हम न होंगे साथ में
बसाये रखना मेरी खुशबू
अपने आँखों में
जैसे बहता है तू आँखों में, और
कभी आंसू बन जाता है.....

मैंने दिल में रखा है तुम्हें
सदियों से क़यामत तक
पूरी कायनात सिमट आती है
मेरे बाँहों के सिलवट तक
ज़िन्दगी चलती रहे
अपनी रफ़्तार से हमेशा यूं ही
कहते हैं दिल से जो चाहो
वो तेरा हो जाता है....

आँखों में चुभती है कभी
शीशे के किरचे की तरह
धुआँ-धुआँ सा हो जाता है
सारा मंज़र
उस धुएँ और बादलों के पार भी
मेरा चाँद
दिल की गहरी नीली झील में
झिलमिलाता है....

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